Description
मेरु पर्वत जितने ओघे (रजोहरण)…
सैकड़ों मेरु पर्वत जितने चरवले…
लेकिन जीव वहीं का वहीं…
राग-द्वेष का ग्राफ़ बिलकुल वैसा का वैसा…
अब इस जन्म की साधना…
इसी बात का पुनरावृत्ति?
या कुछ परिवर्तन?
ग्राफ़ में राग-द्वेष का terrific downfall ?
पढ़िए – मनन कीजिए – पचाए और जिए
पुस्तक – परिणति…


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